एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्टों और न्यायपालिका में पेश आंकड़ों के अनुसार, आज हमारी संसद से लेकर राज्यों की विधानसभाओं तक अपराधियों और धनपतियों की पैठ लगातार गहरी होती जा रही है।
अपराध और संपत्ति के आधिकारिक आंकड़े -
1. संसद (लोकसभा व राज्यसभा) का परिदृश्य: -
"लोकसभा": - 18वीं लोकसभा के 543 सांसदों में से 251 सांसदों (46%) पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से 170 सांसदों (31%) पर हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर संगीन आपराधिक मामले दर्ज हैं।
"राज्यसभा": - राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 75 सांसदों (33%) पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से 40 सांसदों (18%) पर अति-गंभीर आपराधिक धाराएं हैं।
"धनपतियों की हिस्सेदारी": - 18वीं लोकसभा के 504 सांसद (93%) करोड़पति हैं। सांसदों की औसत संपत्ति करोड़ों में है, जिससे आम नागरिक के लिए चुनाव लड़ना लगभग असंभव सा हो चुका है।
2. मुख्यमंत्रियों और विधानसभाओं की स्थिति: -
देश के 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 14 मुख्यमंत्रियों (50%) ने अपने हलफनामे में खुद पर आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें कई संगीन धाराएं भी शामिल हैं।
देश भर की विधानसभाओं में कुल विधायकों (MLAs) में से लगभग 44% पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
लोकतंत्र के समक्ष उत्पन्न गंभीर संकट -
1. कानून बनाने वाले ही जब कानून तोड़ने के आरोपी हों
संसद और विधानसभाओं का मुख्य कार्य देश के लिए न्यायपूर्ण नीतियां और कानून बनाना है। जब कानून बनाने की मेजों पर वही लोग बैठते हैं जिन पर गंभीर आपराधिक आरोप चल रहे हैं, तो आम नागरिक का न्याय प्रणाली से विश्वास उठने लगता है।
2. जनहित की जगह निजी अपराध छिपाने की होड़ -
राजनीतिक पदों का उपयोग अक्सर सार्वजनिक कल्याण के लिए नहीं, बल्कि खुद पर चल रहे आपराधिक मुकदमों में जांच एजेंसियों के दबाव से बचने, मामलों को लटकाने और सत्ता की छत्रछाया प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
3. नीतियों का व्यवसायीकरण और ठेकेदारी व्यवस्था -
चुनाव लड़ने की लागत करोड़ों में पहुंचने के कारण केवल धनपति ही राजनीतिक दलों का टिकट हासिल कर पाते हैं। चुनाव जीतने के बाद ऐसे जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता जन-विकास न होकर अपने व्यवसाय को बढ़ाना, सरकारी ठेके हासिल करना और चुनाव में लगाए गए पैसों को कई गुना वापस वसूलना बन जाता है।
"आघात सहता लोकतंत्र" - भगत सिंह, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस और लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने एक ऐसे स्वतंत्र भारत का सपना देखा था जहाँ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज सुनी जा सके। लेकिन आज का लोकतंत्र "जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन" की जगह "धनपतियों का, अपराधियों के लिए, सत्ता द्वारा शासन" की ओर बढ़ता दिख रहा है।
यदि कड़े चुनावी सुधार, फास्ट-ट्रैक कोर्ट के माध्यम से त्वरित फैसले और राजनीति को धनबल-बाहुबल से मुक्त करने के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हमारा अर्जित लोकतंत्र केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।
इसके साथ-साथ हमें यह भी समझना होगा कि करीब एक सदी तक चली आजादी की लड़ाई और अनगिनत बलिदानों के बाद अर्जित हमारे लोकतंत्र में हम भारतवासी अचानक "प्रजा" से "नागरिक" बन गए। "प्रजा" सिर्फ शासक की आज्ञा का पालन करती है, सवाल नहीं जबकि "नागरिक" समय समय पर शासकों से सवाल भी करते हैं। अतः आवश्यक है कि अपने भीतर के "नागरिक-बोध" को मरने न दें। जय हिन्द।