Wednesday, September 23, 2026

सुख-दुख की पोटली और मुस्कान

 मुस्कान ही हमें मुकम्मल इन्सान बनाती है। इन्सान के अलावा शायद और किसी जीव को सामान्यतया हँसते नहीं देखा गया है। जीवन-यापन के क्रम में हजारों हजार जद्दोजहद के बीच हमारी मुस्कुराहट हमें नयी उर्जा देती है लेकिन पता नहीं क्यों और कैसे आजकल हम भूल गए हैं अपनी उस सहज मुस्कान को?

संयोग से करीब 22 सालों तक मैं एक ऐसे मकान का निवासी रहा जो एक भीड़भाड़ वाले बाजार के बीच अवस्थित था। अक्सर अवकाश के दिन या वक्त मिलने पर मैं अपने गेट के पास बैठकर वहाँ आते-जाते अनजाने लोगों में सहज और स्वाभाविक मुस्कान की तलाश में उन चेहरों को बहुत गौर से देखा करता था लेकिन अफसोस! मुझे अधिकतर लोगों के चेहरे पर परेशानी, तनाव के ही दर्शन हुए। इसी भीड़ में अगर कुछ परिचितों से नजरें मिलीं तो औपचारिकतावश वे जबरन अपने होंठों पर मुस्कान लाने में भी सफल हुए जिस प्रकार रिशेप्शन पर बैठे लोगों द्वारा ग्राहकों के सामने "व्यावसायिक मुस्कान" सायास उत्पन्न की जाती है। हाँ ! हजारों चेहरे में कभी कभार एकाध चेहरे अनायास सहज भी दिखे। आखिर क्यों और कहाँ खो गयी है हमारी मुस्कान? जबकि हम जानते हैं कि बिना मुस्कान के कैसा इन्सान?

हम सबके जीवन में अक्सर हम अपने अपने स्तर पर पाते हैं कि "सुख की पोटली" बहुत छोटी है और "दुख का बोझ" बहुत बड़ा है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी अक्सर हमें अपना दुख और दूसरे का सुख बड़ा दिखता है जबकि हकीकत यह है कि सबकी परेशानी का अपना अपना सबब है, उसके अलग प्रभाव, उससे निबटने के अपने अपने तरीके और संसाधन हैं लेकिन हर हाल में जीवन के हर संघर्ष में हमारा हौसला ही हमारा सच्चा साथी साबित होता है और हम सब हौसला-रूपी अपने इस परममित्र से जाने अनजाने लगातार दूर क्यों होते जा रहे हैं? कभी कहीं सुना था कि -

बोझ गर होता गमों का तो उठा लेते
जिन्दगी बोझ बनी है तो उठाएं कैसे

लेकिन नहीं मित्रों! मेरी दृष्टि में जिन्दगी बोझ नहीं बल्कि खुदा की नेमत है जिसे हमें अपने श्रम, संघर्ष से और बेहतर बनाने हेतु आजीवन प्रयास करते रहना होगा ताकि आनेवाली पीढ़ी भी हमसे सीखकर संघर्ष की इस विरासत को लेकर आगे का जीवन सफर सफलतापूर्वक तय कर सके। अपनी बहुत पुरानी पंक्तियां याद आयीं कि - 

संघर्ष न किया तो धिक्कार जिन्दगी है
काँटों का सेज फिर भी स्वीकार जिन्दगी है

तो चलिए मित्रों! जीवन के हजारों हजार संघर्षों के बीच, अपने लिए, अपनी आनेवाली पीढ़ी के लिए, समाज, देश, दुनिया में सबके साथ मिलकर जीने के लिए हौसले के साथ हम अपनी मुस्कान को लौटाने की कोशिश करके एक मुकम्मल इन्सान बनने की दिशा में अपना अपना कदम बढ़ाएं। सिर्फ "मुस्कान" शब्द को केन्द्रित करके बहुत पहले कुछ दोहों का सृजन मेरे द्वारा हुआ था उसी के साथ आज विराम लेता हूं कि -

दोनों में अन्तर बहुत, आँखों से पहचान।
स्वाभाविक मुस्कान या, व्यवसायिक मुस्कान।।

जीवन वह जीवन्त है, जहाँ नहीं अभिमान।
सुख - दुख से लड़ते मगर, चेहरे पर मुस्कान।।

ज्ञान किताबी ही नहीं, व्यवहारिक हो ज्ञान।
छले गए विद्वान भी, मीठी जब मुस्कान।।

अपनापन या है जहर, हो इसकी पहचान।
दर्द, प्रेम या और कुछ, क्या कहती मुस्कान।।

क्या किसका कब रूप है, होश रहे औ ध्यान।
घातक या फिर प्रेमवश, या कातिल मुस्कान।।

कभी जरूरत है कभी, मजबूरी श्रीमान।
प्रायोजित होती जहाँ, लज्जित है मुस्कान।।

जीव सभी हँसते कहाँ, आदम को वरदान।
हृदय सुमन का वास तब, स्वाभाविक मुस्कान।।

Friday, September 11, 2026

अपराधियों और धन्नासेठों की गिरफ्त में लोकतंत्र

एक सदी के लंबे संघर्ष, भारत छोड़ो आंदोलन के नारों और अनगिनत बलिदानों की नींव पर जिस भारतीय लोकतंत्र का निर्माण हुआ था, आज वह जन-सेवा का माध्यम न रहकर बाहुबल और धनबल के संरक्षण का अड्डा बनता दिख रहा है।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्टों और न्यायपालिका में पेश आंकड़ों के अनुसार, आज हमारी संसद से लेकर राज्यों की विधानसभाओं तक अपराधियों और धनपतियों की पैठ लगातार गहरी होती जा रही है।

अपराध और संपत्ति के आधिकारिक आंकड़े -

1. संसद (लोकसभा व राज्यसभा) का परिदृश्य: -

 "लोकसभा": - 18वीं लोकसभा के 543 सांसदों में से 251 सांसदों (46%) पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से 170 सांसदों (31%) पर हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर संगीन आपराधिक मामले दर्ज हैं।

 "राज्यसभा": - राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 75 सांसदों (33%) पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से 40 सांसदों (18%) पर अति-गंभीर आपराधिक धाराएं हैं।

 "धनपतियों की हिस्सेदारी": - 18वीं लोकसभा के 504 सांसद (93%) करोड़पति हैं। सांसदों की औसत संपत्ति करोड़ों में है, जिससे आम नागरिक के लिए चुनाव लड़ना लगभग असंभव सा हो चुका है।

2. मुख्यमंत्रियों और विधानसभाओं की स्थिति: -

  देश के 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 14 मुख्यमंत्रियों (50%) ने अपने हलफनामे में खुद पर आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें कई संगीन धाराएं भी शामिल हैं।

 देश भर की विधानसभाओं में कुल विधायकों (MLAs) में से लगभग 44% पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

लोकतंत्र के समक्ष उत्पन्न गंभीर संकट -

1. कानून बनाने वाले ही जब कानून तोड़ने के आरोपी हों
संसद और विधानसभाओं का मुख्य कार्य देश के लिए न्यायपूर्ण नीतियां और कानून बनाना है। जब कानून बनाने की मेजों पर वही लोग बैठते हैं जिन पर गंभीर आपराधिक आरोप चल रहे हैं, तो आम नागरिक का न्याय प्रणाली से विश्वास उठने लगता है।

2. जनहित की जगह निजी अपराध छिपाने की होड़ -
राजनीतिक पदों का उपयोग अक्सर सार्वजनिक कल्याण के लिए नहीं, बल्कि खुद पर चल रहे आपराधिक मुकदमों में जांच एजेंसियों के दबाव से बचने, मामलों को लटकाने और सत्ता की छत्रछाया प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

3. नीतियों का व्यवसायीकरण और ठेकेदारी व्यवस्था -
चुनाव लड़ने की लागत करोड़ों में पहुंचने के कारण केवल धनपति ही राजनीतिक दलों का टिकट हासिल कर पाते हैं। चुनाव जीतने के बाद ऐसे जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता जन-विकास न होकर अपने व्यवसाय को बढ़ाना, सरकारी ठेके हासिल करना और चुनाव में लगाए गए पैसों को कई गुना वापस वसूलना बन जाता है।

"आघात सहता लोकतंत्र" - भगत सिंह, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस और लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने एक ऐसे स्वतंत्र भारत का सपना देखा था जहाँ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज सुनी जा सके। लेकिन आज का लोकतंत्र "जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन" की जगह "धनपतियों का, अपराधियों के लिए, सत्ता द्वारा शासन" की ओर बढ़ता दिख रहा है।

यदि कड़े चुनावी सुधार, फास्ट-ट्रैक कोर्ट के माध्यम से त्वरित फैसले और राजनीति को धनबल-बाहुबल से मुक्त करने के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हमारा अर्जित लोकतंत्र केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।

इसके साथ-साथ हमें यह भी समझना होगा कि करीब एक सदी तक चली आजादी की लड़ाई और अनगिनत बलिदानों के बाद अर्जित हमारे लोकतंत्र में हम भारतवासी अचानक "प्रजा" से "नागरिक" बन गए। "प्रजा" सिर्फ शासक की आज्ञा का पालन करती है, सवाल नहीं जबकि "नागरिक" समय समय पर शासकों से सवाल भी करते हैं। अतः आवश्यक है कि अपने भीतर के "नागरिक-बोध" को मरने न दें। जय हिन्द।