Saturday, June 11, 2011

विकास की गंगा

देश के किसी भाग में चुनाव की घोषणा हुई कि नहीं विभिन्न राजनैतिक दलों की प्रचार गाड़ियों के कानफोड़ूस्पीकर से एक ही आवाज आती है - हमारी पार्टी को वोट दो - हम "विकास की गंगा" बहा देंगे। यह दीगर बात है किगंगा को स्वच्छ करने की योजना ज्यों की त्यों पड़ी है लेकिन इस योजना के नाम पर कितनो की "व्यक्तिगतविकास" की गंगा निरंतर चमक रही है। झारखणड सरकार की सुल्तानगंज से "उत्तरवाहिनी गंगा" को देवघर केशिवगंगा" में नहर द्वारा मिलाने की बहुमुखी योजना बर्षों से फाइल के नीचे जस की तस पड़ी है। लेकिन पंचायतसे लेकर संसद तक किसी न किसी "चुनावी" विकास की गंगा देश में हर समय बहती रहती है।


जीवनदायिनी "भागीरथी" को तो हम बचा ही नहीं पा रहे हैं और चले विकास की गंगा बहाने। बकौल राज कपूरराम की गंगा" तो कब की मैली हो चुकी है इन "पापियों" के पाप धोते धोते। उसके बाद से गंगा की गन्दगी औरबढ़ी है। किसे फिक्र है? लेकिन ये "जननायक" विकास की गंगा बहाये बिना थोड़े ही मानेंगे? क्योंकि इसी विकासकी गंगा में तो लगातार हाथ धोने की तैयारी में प्रतीक्षारत हैं ये लोग ताकि खुद का विकास लगातार होता रहे। भलेआम लोग आंसुओं की गंगा में डूब क्यों न जाय।

हाँ गंगा नये नये रूपों में संशोधित और परिवर्द्धित होकर निकली है अपने देश में। भ्रष्टाचार की गंगा, घोटालों कीगंगा, नक्सलवाद की गंगा आदि आदि। मजे की बात है कि "ओरिजिनल" गंगा सिकुड़ती जा रही है और शेष मेंनिरन्तर विकास हो रहा है। शायद इसी को विकास की गंगा कहते हैं क्या?

विश्वास नहीं तो मधु कोड़ा जी के कारनामे को लीजिये। कमाल कर दिया उन्होंने। पूर्व के जितने भी घोटालेबाज हैं, सभी सकते में हैं कि "गुरू गुड़ और चेला चीनी"। हो भी क्यों नहीं जिस "कोड़ा" में "मधु" लगा हो, वह कोड़ा तोआखिर अपना कमाल किसी न किसी रूप में दिखायगा ही। अब तो "राजा जी" के कारनामे से मधु कोड़ा जी को भीशर्म" आती होगी क्योंकि इनके कारनामे तो गिनीज बुक में जाने योग्य है।

मधु कोड़ा जी ने कमाल दिखाया और पूछताछ के समय "महाजनो येन गतः स पन्थाः" की तर्ज पर घोटालेबाजपूर्वजों" की तरह पहले तो बीमार पड़े फिर कह दिया कि सारे आरोप मेरे "स्वच्छ" छवि" को दागदार करने केलिए गढ़े जा रहे हैं। अब लीजिए - क्या कर लीजियेगा? इससे पहले किसी को कुछ हुआ क्या? फिर वही नेता, वहीमंत्री, वही सब कुछ। "राजा जी" और उनके जैसे कई "स्वनाम धन्य
" " " " " यशस्वी लोग अभी तिहाड़ जेल की शोभा में चार चाँद लगा रहे हैं। हाँ एक बात तो हुई कि इसी बीच आम जनता के "आँसुओं की गंगा" में निरन्तर विस्तार हुआहै। परिणामस्वरूप अन्ना जी और रामदेव जी को बहुत पापड़ बेलने पड़ रहे हैं।

अब धीरे धीरे राज खुल रहे हैं और क्या क्या खुलेंगे पता नहीं? लेकिन आगे जो भी खुलेंगे और अधिक चौकाने वालेहोंगे। अखबार और न्यूज चैनलों को नया नया मसाला मिल रहा है और लगातार मिलते रहने की सम्भावनासुनिश्चित है और उनके "समाचारों की गंगा" मस्त और विकसित होकर बह रही है। दिन बदल बदल कर ये लोगघोटालेबाजों के पक्ष और विपक्ष में अपनी बात को सनसनीखेज ढ़ंग से रख रहे हैं, ताकि "टी० आर० पी० की गंगा" अधिक से अधिक बहे और "विज्ञापन की गंगा" सिर्फ उसी की न्यूज एजेंसी की तरफ आकर्षित हो। आखिर भाईसबको रोजगार चाहिए कि नहीं?

लोकतंत्र की परिभाषा को यदि आज संक्षिप्त रूप में कहा जाय तो उसे "जुगाड़ तंत्र" कह सकते हैं। कहना भीचाहिए। जो जितना जुगाड़ू है "विकास की गंगा" उसके तरफ उतना ही आकर्षित होती है। जुगाड़ तंत्र के लिएअनिवार्य शर्त है कि चाहे जिस तरह से हो, "धन की गंगा" बहती रहे, वो भी स्वस्थ और विकसित होकर। अब यहीहोगा, धन की गंगा बहेगी, जाँच का कोई परिणाम नहीं निकलेगा, जनता की स्मृति तो कमजोर होती ही है भूख औरबेबसी के कारण। सब इतिहास के काले पन्नों मे दफ्न।

घोटाले के जाँच हित बनते हैं आयोग।
सच होगा कब सामने वैसा कहाँ सुयोग।।

Friday, June 10, 2011

जगत-गुरु इन्डिया

बचपन से ही सुनते पढ़ते आया हूँ कि भारत "जगत-गुरु" है। सभ्यता, संसकृति, ज्ञान, विज्ञान के प्रकाश वितरणके साथ साथ गणित के शून्य से लेकर नौ तक के अंकों का जन्मदाता भारत ही तो है। कमोवेश यही स्थिति आजकल भी है। हमें आज भी "जगत-गुरु" होने का गौरव है। मेरी बातों से आप सहमत हो सकते हैं, असहमत हो सकते हैं, आश्चर्यचकित हो सकते हैं। आपका असहमत और आश्चर्यचकित होना एकदम लाजिमी है, क्योंकि आप देख रहे हैं कि विगत दशकों में पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका के पीछे पीछे लगातार चलने वाला भारत, भला जगत-गुरु कैसे हो सकता है? जबकि हमारे अन्दरूनी फैसले भी "व्हाइट हाऊस" के फैसले से निरन्तर प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन आपके आश्चर्य करने से क्या होगा? सच्चाई तो आखिर सच्चाई है। सोलह आने चौबीस कैरेट सच यही है कि हम "जगत-गुरु" थे, हैं और आगे भी रहेंगे। यकीन नहीं आता तो इसके समर्थन में नीचे कुछ दमदार तर्क दिये जा रहे हैं। उसे देखें और यकीन करने को विवश हो जायें।

सबसे पहले व्याकरण के उस नियम के बारे में बात करें जिसमें कहा गया है कि व्यक्तिवाचक संज्ञा का अनुवाद नहीं होता। सच भी है व्यक्ति, स्थान, देश आदि का नाम अन्य भाषाओं में भी ज्यों का त्यों लिखा जाता है। लेकिन भारत का अनुवाद "इन्डिया" किया जाता है। दुनिया के किसी भी देश को यह गौरव प्राप्त है क्या? शायद नहीं। यहाँ तक कि हमारे संविधान की शुरुआत ही "भारत दैट इज इन्डिया---------" से होती है। ऐसा लिखने के पीछे भी भारतीयों का अपना मनोविज्ञान है। अपने पूर्व के शासक के प्रति आज भी हमलोग काफी श्रद्धावान हैं और उनके सम्मान में कोई कमी नहीं आने देना चाहते हैं। प्रमाण स्वरूप देख लें आजादी हासिल करने के दशकों बाद भी हम "भारत" से अधिक "इन्डिया" को मान देते हैं। है न एक अनोखी बात? जो हमें सबसे अलग करता है?

दयालुता हमारी पूँजी है। हम दूसरे के दुख को देखकर अपना दुख भूल जाते हैं। अब देखिये न पिछले दशक में विश्व के कई भागों सहित भारत, सॅारी, इन्डिया में भी खतरनाक आतंकवादी हमले हुए। यहाँ तक कि भारतीय संसद, विधान सभाओं सहित मुम्बई का ताज होटल काण्ड भी हुआ। सारा देश दहल गया। लेकिन हमारे बुद्धजीवियों, मीडिया कर्मियों सहित देश की जनता को भी ११ सितम्बर २००१ को अमेरीकी "वर्ड ट्रेड सेंटर" पर हुए आतंकवादी हमले की तकलीफ अधिक है वनिस्पत अपने देश में हुए खतरनाक हमलों के। अपने देश पर हुए आतंकी कार्यवाही को भूलकर हमलोग "वर्ड ट्रेड सेंटर" हुए हमले की "बरसी" को हर साल श्रद्धा पूर्वक याद करते हैं। विश्व में शायद हीइस तरह का कोई दूसरा उदाहरण हो? एक बिशिष्टता और हुई हमारी "जगत-गुरु" होने की।

"अतिथि देवो भव" का सिद्धान्त हमारी संस्कृति का मूल है। विदेशों में जाने के लिए सुरक्षा जाँच के नाम पर हमारे रक्षा मंत्री तक के कपड़े क्यों न उतरवा लिए जाएँ, लेकिन अमेरिकन राष्ट्रपति बुश के आगमन के पूर्व ही उनके "कुत्ते" तक के लिए भारत में "फाइव स्टार" होटल
" के कमरे आरक्षित करा दिये जाते हैं। है इस तरह की कोई मिसाल विश्व में? उसपर मान आदर इतना कि उन कुत्तों को राजघाट में राष्ट्रपिता गाँधी की समाधि तक घूमने की छूट दे दी जाती है। अभी आदरणीय "कसाब जी" की शासकीय तामीरदारी के बारे में तो हम सभी जान ही रहे हैं। हमारा यही "आतिथ्य भाव" विश्व में हमें सर्वश्रेष्ठ बनाता है।

हमारी सहनशीलता के क्या कहने? हमारा पड़ोसी मुल्क, जिसे अगर भारत ठीक से देख भी दे तो मुश्किल में पड़ जाता है, हमें कई तरह से परेशान किये हुए है। हम कई बार "आर-पार की लड़ाई" की की बात भी कर चुके हैं, सीमा पर सेना भेजकर भी लड़ाई नहीं किए और तबतक नहीं करेंगे जबतक "व्हाइट हाऊस" से ग्रीन सिग्नल नहीं मिलेगा।सहनशीलता की यह पराकाष्ठा है जो अन्यत्र शायद ही देखने को मिले। अतः इस "इन्डिया" की एक और बिशेषता मानी जानी चाहिए।

संसद, शासन का बड़ा और विधान सभा छोटा मंदिर माना जाता है। इन मंदिरों के संचालन के लिए हमलोगों ने "वोट" देकर कुछ ऐसी बिशिष्ट आत्माओं को भेज दिया है जिनका हाल ही में "अपराधी" से "नेता" के रूप में "रासायनिक परिवर्तन" हुआ है। मजे की बात है कि कल तक देश की पुलिस जिन्हें गिरफ्तार करने के लिए भटक रही थी, आज वही पुलिस उन्हें "सुरक्षा" प्रदान करने को भटक रही है। इन्डिया की इस बिशेषता पर कौन न मर जाय?

इसके अतिरिक्त और भी कई ऐसी बिशिष्टताओं से भरपूर इस इन्डिया के शान में और बहुत कुछ जोड़ा जा सकता है, लेकिन कथ्य के लम्बा होने के डर से विराम दे रहा हूँ। कोई शंका होने पर उसकी भी चर्चा भबिष्य में करूँगा।लेकिन आप मान लें कि आज भी इन्डिया "जगत-गुरु" है, पहले भी था और निरन्तर उन्नति को देखते हुए आगे की संभावना बरकरार है
क्योंकि कल की ही तो बात है जब हमारे शासकों ने एक संत को सबक सिखाया और हजारों सोये निहत्थे अनशनकारियों के प्रति रामलीला मैदान में पुलिसिया "दयालुता" दिखाने में जो भूमिका निभायी है वह विश्व में सबके लिए अनुकरणीय है। और अन्त में-

जगत-गुरु इन्डिया है अबतक बदले चाहे रूप हजार।
ज्ञान योग सिखलाया पहले आज मंत्र है भ्रष्टाचार।।

Thursday, June 9, 2011

पत्नी-पुराण

शेर की शादी में चूहे को देखकर हाथी ने पूछा - "भाई तुम इस शादी में किस हैसियत से आये हो?" चूहा बोला, " जिस शेर की शादी हो रही है, वह मेरा छोटा भाई है।" हाथी का मुँह खुला का खुला रह गया, बोला, "शेर और तुम्हाराछोटा भाई?" चूहा - "क्या कहूँ? शादी के पहले मैं भी शेर ही था।" यह तो हुई मजाक की बात, लेकिन पुराने समय सेही दुनिया का मोह छोडकर, सच की तलाश में भटकनेवाले भगोडों को सही रास्ते पर लाने के लिए, शादी कराने कारिवाज हमारे समाज में रहा है। कई बिगडैल कुँवारों को इसी पद्धति से आज भी रास्ते पर लाया जाता है। हम सबनेकई बार देखा-सुना है कि तथाकथित सत्य की तलाश में भटकने को तत्पर आत्मा, शादी के बाद पत्नी को प्रसन्नकरने के लिए लगातार भटकती रहती है। कहते भी हैं कि "शादी वह संस्था है जिसमें मर्द अपनी 'बैचलर डिग्री' खोदेता है और स्त्री 'मास्टर डिग्री' हासिल कर लेती है।"

प्रायः शादी के पहले की जिंदगी पत्नी को पाने के लिए होती है और शादी के बाद की जिंदगी पत्नी को खुश रखने केलिए। तकरीबन हर पति के लिए पत्नी को खुश रखना एक अहम और ज्वलंत समस्या होती है और यह समस्याचूँकि सर्वव्यापी है, अतः इसे हम चाहें तो राष्ट्रीय (या अंतर्राष्ट्रीय) समस्या भी कह सकते हैं। लगभग प्रत्येक पतिदिन-रात इसी समस्या के समाधान में लगा रहता है, पर कामयाबी बिरलों के भाग्य में ही होती है। सच तो यह हैकि आदमी की पूरी जिंदगी पत्नी को ही समर्पित रहती है और पत्नी है कि खुश होने का नाम ही नहीं लेती। अगरखुश हो जाएगी तो उसका बीवीपन खत्म हो जाएगा, फिर उसके आगे-पीछे कौन घूमेगा? किसी ने ठीक ही तो कहाहै कि "शादी और प्याज में कोई खास अन्तर नहीं - आनन्द और आँसू साथ-साथ नसीब होते हैं।"

पत्नी को खुश रखना इस सभ्यता की संभवतः सबसे प्राचीन समस्या है। सभी कालखण्डों में पति अपनी पत्नी कोखुश रखने के आधुनिकतम तरीकों का इस्तेमाल करता रहा है और दूसरी ओर पत्नी भी नाराज होने की नई-नईतरकीबों का ईजाद करती रहती है। एक बार एक कामयाब और संतुष्ट-से दिखाई देनेवाले पति से मैंने पूछा-'क्योंभाई पत्नी को खुश रखने का उपाय क्या है?' वह नाराज होकर बोला- 'यह प्रश्न ही गलत है। यह सवाल यूँ होनाचाहिए था कि पत्नी को भी कोई खुश रख सकता है क्या?' उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि "शादी और युद्ध में सिर्फएक अन्तर है कि शादी के बाद आप दुश्मन के बगल में सो सकते हैं।"

जिस पत्नी को सारी सुख-सुविधाएँ उपलब्ध हों, वह इस बात को लेकर नाराज रहती है कि उसका पति उसे समयही नहीं देता। अब बेचारा पति करे तो क्या करे? सुख-सुविधाएँ जुटाए या पत्नी को समय दे? इसके बरअक्स कईपत्नियों को यह शिकायत रहती है कि मेरे पति आफिस के बाद हमेशा घर में ही डटे रहते हैं। इसी प्रकार के आदर्श-पतिनुमा एक इन्सान(?) से जब मैंने पूछा कि 'पत्नी को खुश रखने का क्या उपाय है?' तो उसने तपाक से उत्तरदिया-'तलाक।' मुझे लगा कि कहीं यह आदमी मेरी ही बात तो नहीं कह रहा है? मैं सोचने लगा " 'विवाह' औरविवाद' में केवल एक अक्षर का अन्तर है शायद इसलिए दोनों में इतना भावनात्मक साहचर्य और अपनापन है।" '

पतिव्रता नारियों का युग अब प्रायः समाप्ति की ओर है और पत्नीव्रत पुरुषों की संख्या, प्रभुत्व और वर्चस्वलगातार बढत की ओर है। यदि इसका सर्वेक्षण कराया जाय तो प्रायः हर दूसरा पति आपको पत्नीव्रत मिलेगा।मैंने सोचा क्यों न किसी अनुभवी पत्नीव्रत पति से मुलाकात करके पत्नी को खुश रखने का सूत्र सीखा जाए।सौभाग्य से इस प्रकार के एक महामानव से मुलाकात हो ही गई, जो इस क्षेत्र में पर्याप्त तजुर्बेकार थे। मैंने अपनीजिज्ञासा जाहिर की तो उन्होंने जो भी बताया, उसे अक्षरशः नीचे लिखने जा रहा हूँ, ताकि हर उस पति का कल्याणहो सके, जो पत्नी-प्रताडना से परेशान हैं -

१ - ब्रह्ममुहुर्त में उठकर पूरे मनोयोग से चाय बनाकर पत्नी के लिए 'बेड टी' का प्रबंध करें। इससे आपकी पत्नीका 'मूड नार्मल' रहेगा और बात-बात पर पूरे दिन आपको उनकी झिडकियों से निजात मिलेगी। वैसे भी, किसी भीपत्नी के लिए पति से अच्छा और विश्वासपात्र नौकर मिलना मुश्किल है, इसलिए इसे बोझस्वरूप न लें, बल्किसहजता से युगधर्म की तरह स्वीकार करें। कहा भी गया है कि "सर्कस की तरह विवाह में भी तीन रिंग होते हैं - एंगेजमेंट रिंग, वेडिंग रिंग और सफरिंग।"

२ - अगर आपका वास्ता किसी तेज-तर्रार किस्म की पत्नी से है तो उनके तेज में अपना तेज (अगर अबतक बचाहो तो) सहर्ष मिलाकर स्वयं निस्तेज हो जाएँ। क्योंकि कोई भी पत्नी तेज-तर्रार पति की वनिस्पत ढुलमुल पतिको ही ज्यादा पसन्द करती है। इसका यह फायदा होगा कि आप पत्नी से गैरजरूरी टकराव से बच जाएँगे, अब तोजो भी कहना होगा, पत्नी कहेगी। आपको तो बस आत्मसमर्पण की मुद्रा अपनानी है।

३- आपकी पत्नी कितनी ही बदसूरत क्यों न हो, आप प्रयास करके, मीठी-मीठी बातों से यह यकीन दिलाएँ किविश्व-सुन्दरी उनसे उन्नीस पडती है। पत्नी द्वारा बनाया गया भोजन (हलाँकि यह सौभाग्य कम ही पतियों कोप्राप्त है) चाहे कितना ही बेस्वाद क्यों न हो, उसे पाकशास्त्र की खास उपलब्धि बताते हुए पानी पी-पीकर निवाले कोगले के नीचे उतारें। ध्यान रहे, ऐसा करते समय चेहरे पर शिकायत के भाव उभारना वर्जित है, क्योंकि "विवाह वहप्रणाली है, जो अकेलापन महसूस किए बिना अकेले जीने की सामर्थ्य प्रदान करती है।"

४ - पत्नी के मायकेवाले यदि रावण की तरह भी दिखाई दे तो भी अपने वाकचातुर्य और प्रत्यक्ष क्रियाकलाप सेउन्हें 'रामावतार' सिद्ध करने की कोशिश में सतत सचेष्ट रहना चाहिए।

५ - आप जो कुछ कमाएँ, उसे चुपचाप 'नेकी कर दरिया में डाल' की नीति के अनुसार बिल्कुल सहज समर्पित भावसे अपनी पत्नी के करकमलों में अर्पित कर दें और प्रतिदिन आफिस जाते समय बच्चों की तरह गिडगिडाकरदो-चार रूपयों की माँग करें। पत्नी समझेगी कि मेरा पति कितना बकलोल है कि कमाता खुद है और रूपये-दोरूपयों के लिए रोज मेरी खुशामद करता रहता है। एक हालिया सर्वे के अनुसार लगभग पचहत्तर प्रतिशत पतिइसी श्रेणी में आते हैं। मैं अपील करता हूँ कि शेष पच्चीस प्रतिशत भी इस विधि को अपनाकर राष्ट्र की मुख्यधारामें सम्मिलित हो जाएँ और सुरक्षित जीवन-यापन करें।

अंत में उस अनुभवी महामानव ने अपने इस प्रवचन के सार-संक्षेप के रूप में यह बताया कि उक्त विधियों कोअपनाकर आप भले दुखी हो जाएँ, लेकिन आपकी पत्नी प्रसन्न रहेगी और उनकी मेहरबानी के फूल आप परबरसते रहेंगे। किसी ने बिलकुल ठीक कहा है कि "प्यार अंधा होता है और शादी आँखें खोल देती है।" मेरी भी आँखेंखुल गई। कलम घिसने का रोग जबसे लगा, साहित्यिक मित्रों की आवाजाही घर पर बढ गई। चाय-पानी के चक्करमें जब पत्नी मुझे पूतना की तरह देखती तो मेरी रूह काँप जाती थी। मैंने इससे निजात पाने का रास्ता ढूँढ हीलिया।

आपने फूल कई रंगों के देखे होंगे, लेकिन साँवले या काले रंग के फूल प्रायः नहीं दिखते। मैंने अपने नाम 'श्यामल' के आगे पत्नी का नाम 'सुमन' जोड लिया। हमारे साहित्यिक मित्र मुझे 'सुमनजी-सुमनजी' कहकर बुलाते हुए घरआते। धीरे-धीरे नम्रतापूर्वक मैंने अपनी पत्नी को विश्वास दिलाने में आश्चर्यजनक रूप से सफलता पाई कि मेरेउक्त क्रियाकलाप से आखिर उनका ही नाम तो यशस्वी होता है। अब मेरे घर में ऐसे मित्रों भले ही स्वागत-सत्कारकम होता हो, पर मैं निश्चिन्त हूँ कि अब उनका अपमान नहीं होगा। किसी ने ठीक ही कहा है कि "विवाह वहसाहसिक-कार्य है जो कोई बुजदिल पुरुष ही कर सकता है।"

Wednesday, June 8, 2011

एक कोशिश

मैं सोचता हूँ कि मैं सोच सकता हूँ और यह भी सोचता हूँ कि आखिर क्यों सोचता हूँ? सिर्फ सोचने से तो कोई काम अंजाम तक नहीं पहुंचेगा, कुछ न कुछ करना ही पड़ता है। साथ ही यह भी सच है कि बिना सोचे कोई काम ढ़ंग से किया भी तो नहीं जा सकता।

फिर सोच में पड़ जाता हूँ कि क्या किया जाय? बिना कर्म के सोचने का कोई अर्थ नहीं और बिना सोचे, किये गए कर्म भी अर्थहीन हो जाते हैं।

आखिर इस अन्तर्द्वन्द का निदान क्या है? यह भी सोचने को लगातार विवश करता है।

फिर सोचता हूँ कि सोच हमेशा अग्रगामी है और कर्म सतत अनुगामी। उपाय तब तो एक ही दिख रहा है कि स्वयं के सोच और कर्म के बीच की दूरी को अपने यथार्थ जीवन में निरन्तर कम करने की कोशिश हो ताकि जीवन के अंतर्द्वंद कम से कमतर हो सके और अनावश्यक सोच की काली छाया से मुक्त होकर यह छोटी सी जिन्दगी सही राह पर चल सके।

और पुनः सोचता हूँ कि काश दिल्ली में बैठे हमारे रहनुमा भी अपनी कथनी और करनी के बीच की दूरियों को कम करने की दिशा में सोच पाते तो भारत की तस्वीर आज कुछ और होती।

Tuesday, June 7, 2011

जीवन का गणित

कहने को तो साँसें चलतीं हैं यात्रा-क्रम भी प्रतिपल बढ़ता जाता है।
मैंने तो देखा सौ बर्षों में मुश्किल से कोई एक दिवस जी पाता है।।

अचानक आज अपने जिन्दगी के दिनों का मोटे तौर पर हिसाब करने लगा। कहते हैं कि साहित्य वैयक्तिक अनुभूति की निर्वैयक्तिक प्रस्तुति है और आज उसी व्यक्तिगत अनुभव को आप सब के बीच बाँटने की कोशिश कर रहा हूँ।

एक इन्सान अमूमन लगभग सत्तर साल जीता है और साल के तीन सौ पैंसठ दिन के हिसाब से लगभग चौबीस हजार दिनों की आयु मानी जा सकती है। दिन रात मिलाकर चौबीस घण्टे होते हैं। अगर चौबीस घण्टे के समय का दैनिक हिसाब कर लिया जाय तो जीवन का हिसाब स्वतः लग जायगा यानि जितने घण्टे उतने हजार दिन।


हर चौबीस घण्टे में प्रायः हम सभी मोटे तौर पर आठ घण्टा सोते हैं और आठ घण्टा रोजी रोटी के लिये या तो काम करते हैं या भबिष्य में काम मिले, इसका प्रयास करते हैं अर्थात पढ़ाई, लिखाई, प्रशिक्षण इत्यादि। यह किसी भी आदमी के लिए अत्यावश्यक है। यानि चौबीस घण्टे में से सोलह घण्टे सिर्फ इन अनिवार्यताओं के लिए निकल गए जिस पर हमारा कोई वश नहीं होता। तो इस हिसाब से हमारे जीवन के लगभग सोलह हजार दिन सिर्फ इन दो बातों की भरपाई में ही बीत जाते हैं। अब बचे आठ हजार दिन। इस आठ हजार दिनों का भी मोटा मोटी हिसाब करने की जरूरत महसूस हुई।


यदि ध्यान से सोचा जाय तो उक्त दो महत्वपूर्ण कार्यों के अतिरिक्त कई काम ऐसे हैं जो हमें जीने के लिए करने ही पड़ते हैं। मसलन मुँह धोने से लेकर नहाने तक, कपड़ा बनबाने से लेकर साफ करने और पहनने तक, सामाजिक कार्य जैसे शादी-विवाह, श्राद्ध, आदि में शामिल होना, घर पर मित्रों का आना और मित्रों के घर जाना, बाजार के दैनिक कार्यों का निपटारा, और अन्य कई इसी तरह के दैनिक क्रियाकलापों का जब हम सूक्षमता से अध्ययन करते हैं तो पाते है कि बचे हुए आठ घण्टे में से चार घण्टे खर्च हो जाते हैं। यानि चार हजार दिन और खत्म। अब शेष चार हजार दिनों के बारे में यदि सोचें तो बचपन के कुछ दिनों निकालना होगा क्योंकि बचपन में न तो उतनी समझ होती हैऔर वह स्थिति परवशता की होती है।


सही अर्थों में यदि देखा जाय तो औसतन एक इन्सान के जीवन में मात्र ढ़ाई से तीन हजार दिन ही ऐसे होते हैं जिसे वह अपनी मर्जी से जी सकता है। जरा सोचें कि कितना कम समय है जीने के लिए और काम कितना करना है। हो सकता है कि कई लोगों को यह भी लगे कि यह एक नकारात्मक सोच है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी हैकि अगर ये बात किसी के हृदय में उतर जाय तो वह व्यक्ति कभी भी अपना समय खोटा नहीं करेगा और जिन्दगी में हर कदम सार्थकता की ओर उठेंगे। पता नहीं आप सब किस प्रकार से सोचते है? लेकिन कम से कम मेरे कदम तो उठे इस दिशा में, इसी कोशिश में हूँ।

जिन्दगी धड़कनों की है गिनती का नाम।
फिर जो बैठे निठल्ले है उनको प्रणाम।।

Sunday, June 5, 2011

आम आदमी और बाढ़ का सुख

शीर्षक की सार्थकता रखते हुए पहले "आम आदमी" की बात कर लें। "आम" एक स्वादिष्ट, मँहगा और मौसमी फल है, जिसकी आमद बाढ़ की तरह साल में एक ही बार होती है। मजे की बात है कि आम चाहे जितना भी कीमती क्यों न हो, अगर वह किसी भी शब्द के साथ जुड़ जाय तो उसका भाव गिरा देता है। मसलन- आम आदमी, आम बात, आम घटना, दरबारे आम, आम चुनाव इत्यादि। अंततः हम सभी "आम आदमी" की भौतिक उपस्थिति और उनको मिलने वाले "पंचबर्षीय सम्मान" से पूर्णतः अवगत हैं।

मैं भी उन कुछ सौभाग्यशाली लोगों में से हूँ जिसका जन्म कोसी प्रभावित क्षेत्र में हुआ है। एक लघुकथा की चर्चा किए बिना बात नहीं बनेगी। बाढ़ के समय आकाश से खाद्य - सामग्री के पैकेट गिराए जाते हैं और प्रभावित आम आदमी और उनके बच्चे उसे लूटकर खूब मजे से खाते हैं, क्योंकि आम दिनों में तो गरीबी के कारण इतना भी मयस्सर नहीं होता। बाढ़ का पानी कुछ ही दिनों में नीचे चला जाता है और आकाश से पैकेट का गिरना बंद। तब एक मासूम बच्चा अपनी माँ से बड़ी मासूमियत से सवाल पूछता है कि - " माँ बाढ़ फिर कब आएगी"? अपने आप में असीम दर्द समेटे यह लघुकथा समाप्त। लेकिन बच्चों का अपना मनोविज्ञान होता है और वह पुनः बाढ़ की अपेक्षा करता है एक सुख की कामना के साथ।

मौसम में "सावन-भादों" का अपना एक अलग महत्व है। दंतकथा के अनुसार अकबर भी बीरबल से सवाल करता है कि - एक साल में कितने महीने होते हैं? तो बीरबल उत्तर देता है - दो, यानि सावन-भादो, क्योंकि पूरे साल इसी दो महीनों की बारिश की वजह से फसलें होतीं हैं। बहुत पहले एक फिल्म आयी थी "सावन-भादों" और उससे उत्पन्न दो फिल्मी कलाकार नवीन निश्छल और रेखा आज भी कमा खा रहे हैं। कभी आपने सुल्तानगंज से देवघर की यात्रा की है? यदि हाँ तो जरूर सुना होगा कि इस एक सौ बीस किलोमीटर की दूरी में बसनेवाले "आम आदमी" मात्र दो महीने अर्थात "सावन- भादो" की कमाई पर ही साल भर गुजारा करते है।

ठीक इसी तरह "कोसी परियोजना" या फिर "बाढ़ नियंत्रण विभाग", "जल-संसाधन विभाग" आदि से जुड़े "सरकारी" लोगों के लिए "सावन-भादों" का अपना महत्व है और उससे उत्पन्न सुख से उनका साल भर बिना "नियमित वेतन" को छुए, बड़े मजे से गुजारा चलता है। यदि बाढ़ आ जाए तो फिर क्या कहने?

भारत भी अजब "राष्ट्र" है जिसके अन्दर "महाराष्ट्र" जैसा राज्य है। ठीक उसी तरह बिहार राज्य के अन्दर एक ही जगह का नाम "बाढ़" है और "बाढ़" को छोड़कर कई जगहों में हर साल बाढ़ आती है। जहाँ पीने के पानी के लिए लोग हमेशा तरसते हैं, वहाँ के लोग आज "पानी-पानी" हो गए है और "रहिमन पानी राखिये" वाली बात को यदि ध्यान में रखें तो प्रभावित लोगों का आज "पानी" ख़तम हो रहा है।

बाढ़ के साथ कई प्रकार के सुख का आगमन स्वतः होता है। जैसे बाँध को टूटने से बचाने के लिए उपयोग लाये जानेवाले बोल्डर, सीमेंट का भौतिक उपयोग चाहे हो या न हो लेकिन खाता-बही इस चतुराई से तैयार किए जाते हैं कि किसी जाँच कमीशन की क्या मजाल जो कोई खोट निकाल दे? रही बात राहत- पुनर्वास के फर्जी रिहर्सल की, वो भी बदस्तूर चलता रहता है। मजे की बात है कि पिछले साल के लाखों बाढ़ प्रभावित लोगों को आज भी राहत पुनर्वास का इन्तजार है।

न्यूज चैनल वालों का भी "सबसे पहले पहुँचने" का एक अलग सुख है। डूबते हुए लोगों से पूछना - आप कैसा महसूस कर रहे हैं? आदि बेतुके और चिरचिराने वाले सवालों का, वीभत्स और अन्दर तक झकझोरने वाले दृश्यों को बार-बार दिखलाने का, राहत पुर्वास के नाम पर नेताओं के बीच नकली "मीडियाई युद्ध" कराने का भी आनंद ये लोग खूब उठाते हैं।

"कटा के अंगुली शहीदों में नाम करते हैं" वाली कहावत यहाँ साक्षात चरितार्थ होती है। "थोडी राहत - थोड़ा दान, महिमा का हो ढ़ेर बखान" - ऐसा दृश्य भी काफी देखने को मिलता है। एक से एक "आम जनता" के तथाकथित "शुभचिंतक" कहाँ से आ जाते हैं, राजनैतिक रोटी सकने के लिए कि क्या कहूँ? बाढ़ के कारण चाहे लाखों एकड़ की फसलें क्यों न बर्बाद हो गईं हों, लेकिन राजनितिक "फसल" लहलहा उठते हैं। राजनीतिज्ञों के "हवाई-सर्वेक्षण" का अपना सुख है। ऊंचाई से देखते हैं कि "आम आदमी कितने पानी" में है? और आकाश से ही तय होता है कि अगले पाँच बरस तक आम आदमी की "भलाई" कौन करेगा।

निष्कर्ष यह कि "आम" और "बाढ़" दोनों राष्ट्रीय धरोहर हैं - एक राष्ट्रीय फल तो एक राष्ट्रीय
आपदा। जय-हिंद।।