Monday, September 26, 2016

संसद और हम

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र यानि भारत के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यह देश संविधान से चलता है और यह सैद्धांतिक रूप से सही भी है। जिस प्रकार देश में कार्यपालिका के संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति होते हैं और व्यवहारिक प्रमुख प्रधानमंत्री। ठीक उसी तरह संविधान तो सबसे ऊपर है ही पर व्यवहारिक संवैधानिक शक्ति हमारे देश के संसद के पास है जिसका प्रमाण है अबतक संसद द्वारा शताधिक संविधान संशोधन। संसद हमारी लोकतन्त्रीय व्यवस्था के लिए रीढ़ के समान है। इसे लोकतंत्र का मंदिर भी कहा जाता है। संसद के दायरे में संसद के अतिरिक्त विधान सभाओं को भी देखने / समझने की जरूरत है। पर उस संसद की स्थिति आज क्या है? हम सब जानते हैं। तब मेरे जैसे कलमकार को कहना पड़ता है कि -

जहाँ पर देश की बातें सुजन करते हैं वो संसद 
विरोधों में भी शिष्टाचार की पहचान है संसद 
कई दशकों के अनुभव से क्यूँ हमने ये नहीँ सीखा 
अशिष्टों की लड़ाई का अखाड़ा बन गया संसद 

सत्तर के दशक से आजतक करीब करीब सभी दलों की कहानी यही रही कि सबने पहले अपराधी का राजनीतिकरण किया और बाद में राजनीति का अपराधीकरण करने में अपने अपने स्तर से योगदान दिया। कभी किसी समाजशास्त्री ने कहा था कि "प्रजातंत्र मूर्खों का शासन है" और आजकल हमारे सांसदों के व्यवहार ने इसे साबित भी कर दिया है। तब लेखनी स्वतः कहती है कि -
 
राष्ट्रगान आए ना जिनको, वो संसद के पहरेदार 
भारतवासी अब तो चेतो, लोकतंत्र सचमुच बीमार

कहने को जनता का शासन लेकिन जनता दूर बहुत 
रोटी, पानी खातिर तन को बेच रहे, मजबूर बहुत 
फिर कैसे उस "गोत्र-मूल" के लोग ही संसद जाते हैं 
हर चुनाव में नम्र भाव फिर दिखते हैं मगरूर बहुत 
प्रजातंत्र मूर्खों का शासन कथन हुआ बिल्कुल साकार 
भारतवासी अब तो चेतो लोकतंत्र सचमुच बीमार 

संसद में होनेवाली अभद्रता, मनमानी, वैचारिक बहस से दूर "बायकाट" या कार्यवाही ना चलने देना आदि आदि से लेकर सदस्यों के वेतन / भत्ता / सुविधा बढ़ोतरी वाले विधेयक को पास कराने में सारे सदस्यों की चट्टानी एकता आदि को समान रूप से बार बार देखने के पश्चात एक सम्वेदनशील हृदय ये बात स्वतः निकलती है कि - 

देशभक्ति जनहित की बातें सब करते हैं संसद में 
अपने अपने स्वारथ में वो नित लड़ते हैं संसद में 
मरी जनता बेचारी! खेल तू संसद संसद! ! 

अक्सर जो चुनकर जाते हैं लोगों संग आघात किया 
नाम वही सुर्खी में यारों जो जितना अपराध किया 
रोज बढ़ती बेकारी! खेल तू संसद संसद! ! 

फिर ऐसे निर्मम खेल से आहत होकर मन क्रोधित होकर कह उठता है कि - 

कोई सुनता नहीँ मेरी तो गा कर फिर सुनाऊँ क्या 
सभी मदहोश अपने में तमाशा कर दिखाऊँ क्या 
बहुत पहले भगत ने कर दिखाया था जो संसद में 
ये सत्ता हो गयी बहरी धमाका कर दिखाऊँ क्या 

लेकिन सत्य अहिंसा की इस धरती पर धमाका स्वीकार्य नहीँ। असल धमाका तो तब होगा जब हम अपने लोकतन्त्रीय अधिकार यानि मतदान की कीमत को सही अर्थों में समझकर बहादुरी से सिर्फ नेक लोगों को संसद भेज पाने में सफल होंगे। एक जागा हुआ देशवासी यह आह्वान करता है कि - 

शासन का मंदिर है संसद क्यों लगता लाचार 
कुछ जनहित पर भाषण दे कर स्वारथ का व्यापार 
रंगे सियारों को पहचाने बदला जिसने वेष 
कागा! ले जा यह संदेश! घर घर दे जा यह संदेश!!

और अन्त में दोस्तों -

धरा के गीत गाते हैं, गगन के गीत गाते हैं 
शहीदों की चिताओं पर नमन के गीत गाते हैं 
सुमन सारे सहजता से खिलेंगे जब मेरे यारा 
चमन के तब सुमन मिलके वतन के गीत गाते हैं 
सादर
श्यामल सुमन

Tuesday, August 11, 2015

सृजन हमारा धर्म

अन्तर्जाल की दुनिया में प्रायः हम सब लेखन, पठन, पाठन, परस्पर प्रतिक्रिया प्रेषण और धन्यवाद ज्ञापन अपनी अपनी रुचि, समय और सुविधा के हिसाब से आपस में शब्द और संकेत के माध्यम से व्यक्त करते हैं फिर कभी कभी ऐसे पोस्ट क्यों दिखाई देते जिसमें मित्रों की सूची में शामिल कुछ मित्रों के प्रति कमोवेश नाराजगी की अभिव्यक्ति होती है जबकि साहित्य हमें बेहतर इंसान बनने और बनाने का तरीका सिखाता है साथ ही साथ नित नूतन सृजन हमारा धर्म है इस बात का बोध भी। शुभमस्तु।

Monday, November 17, 2014

आसाराम का अफसोस

शाबाश! मेरे भाई रामपाल!  कमाल कर दिखाया आपने! आज पूरा "संत-समाज" को आप पर फक्र है। धन्य हैं आपके भक्तगण जिनकी चट्टानी एकता के आगे पूरी शासन व्यवस्था लाचार दिखी। आपके इस कार्य से अपने पूर्ववर्ती संत भिण्डरावाले की याद आना स्वाभाविक है जिनको सरकारी आततायियों ने आखिर शहीद कर ही दिया। काश! मुझे भी ये "सद्बुद्धि" समय रहते आ गयी होती? मेरे पास क्या "भक्तों" की कोई कमी थी? लेकिन मैं चूक गया जिसका परिणाम आज भी जेल के सीखचों के अन्दर भोग रहा हूँ।

ऐसा क्यों हुआ? आप रामपाल और मैं आसाराम। "राम" तो दोनों के साथ हैं और हम दोनों ने इसी "राम" के सहारे अपने अपने ढंग से धर्म की दुकानदारी की, इसे अपनी मेहनत और लगन से बढ़ाया और चमकाया भी। लेकिन बहुत बड़ा अन्तर ये है मेरे भाई कि मेरे नाम के पीछे "राम" हैं और आपके नाम में बिल्कुल आगे। एक कारण यह भी हो सकता है कि राम को आगे रखकर आप आगे निकल गए और मैं बहुत पीछे रह गया।

दूसरा जो कारण मुझ अल्प-बुद्धि को दिखायी दे रहा कि आपने राम की महान शक्ति को ध्यान में  रखा।  अपने भक्तों को सम्मोहित कर भक्तों द्वारा "शक्ति" का पालन करवाकर अपने नाम "रामपाल" को सार्थक कर दिया और मैं अपने नाम "आसाराम" को सार्थक करते हुए "राम" से "आस" लगाये बैठा रहा और आज "निरर्थक बना हुआ हूँ। ना जाने इस हाल में और कितने दिनों तक रहूँगा। यही मुझसे तकनीकी चूक हुई और इसका अफसोस मुझे मरने तक रहेगा। हाँ रामपाल जी इस निरर्थक बने "आसाराम" को आपसे बहुत "आस" है। आपके सफलता की अशेष शुभकामनाएँ।

Wednesday, November 5, 2014

साईकिल से साईकिल तक

याद आती है आज से ३० साल पहले की घटना यानि सन १९८४ के अक्टूबर माह की जब मैं  पहली बार साईकिल छोड़कर मोपेड (उन दिनों सुवेगा) की सवारी करने लगा था। कितना खुश था मैं? क्या कहूँ? शुरू शुरू में जब सड़कों पर मोपेड दौड़ाता था तो लगता था कि हवा में उड़ रहा हूँ। उससे भी बड़ी बात कि चलो साईकिल से निजात तो मिली। उन दिनों में किसी के पास गाड़ी का होना "स्टेटस सिम्बाल" माना जाता था और साथ ही सालों साल साईकिल की सवारी करने के कारण मन में अनायास उपजे "हीन-ग्रंथि" से भी मुक्ति मिली। समय बदला, साल बदले, फिर स्कूटर बाद में मोटर साईकिल और उसके बाद कार भी आई दरवाजे पर।  

एक आर्ष वचन है कि "शरीरमाद्यौ खलु धर्म साधनम्" अर्थात शरीर ठीक ठाक रहेगा तब ही धर्म (कर्तव्य) साधना समभ्भव है। सच यह है कि शरीर स्वस्थ रखने के लिए मैं कुछ भी प्रयास अलग से नहीं करता अर्थात  व्यायाम, टहलना, अनुलोम विलोम इत्यादि। कारपोरेट आफिस की आरामदेह (शारीरिक रूप से) नौकरी शेष समय घर में सुबह शाम बैठकर चाय - नाश्ता का आनन्द लेते हुए पठन पाठन और लेखन या फिर कोई साहित्यिक कार्यक्रम तक सिमट कर रह गया।

ठीक ३० साल बाद अक्टूबर २०१४ में मैं सोचने को विवश हो गया कि इस ५५ साल की उम्र में मुझे कुछ ना कुछ तो स्वस्थ रहने के लिए करना ही पडेगा। बहुत कुछ सोचने  और परिजन सहित मित्रगणों की वक्रोक्ति के बाद भी मैंने अपने बिछुड़े हुए साथी साईकिल से फिर दोस्ती करने की ठानी और नयी साईकिल खरीदी।

अब मैं करीब २० दिनों से नित्य साईकिल से आफिस आना जाना करता हूँ। शारीरिक रूप से तो बेहतर महसूस करता ही हूँ साथ ही आफिस में मेरे कई साथी अचरज और प्रशंसा भरी दृष्टि से मेरे इस प्रयास को देखते हैं तो अच्छा लगता है। पता नहीं ३० साल पुरानी वो "हीन-ग्रंथि" कहाँ खो गयी?

डर

अक्सर लोग कहते हैं कि डरना बुरी बात है और यह भी कहते हैं कि एक व्यवस्थित जिन्दगी के लिए डर का होना भी जरूरी है वरना हम में से अधिकांश लोग स्वेच्छाचारी हो जाएंगे।

दोनों ही स्थितियाँ सच है और इसको स्थापित करने के सबके अपने अपने तर्क भी।

डर - किस बात का? हम सबने जो कुछ (सुख-सुविधा, प्रतिष्ठा आदि) अबतक पाया उसके खो जाने का या भबिष्य की चाहत को ना पाने का?

विद्रूप सामाजिक स्थिति में परिवर्तन लाने की दिशा में जो सबसे बड़ी बाधा है वो यही "डर" है शायद।

Tuesday, October 8, 2013

बाजारवाद और पत्रकारिता

शुरूआती दिनों से आजतक और आगे भी पत्रकारिता जन जागरण के लिए एक पवित्र किन्तु जोखिम भरा काम रहा है। इतिहास साक्षी है कि आमलोगों की बेहतरी और उनके बीच चेतना विकसित  करने के लिए समर्पित पत्रकारों ने कितनी कुर्बानियाँ दी है। यहाँ तक कि गलत नीतियों के कारण ताकतवर सत्ताधीशों को गद्दी छोड़ने के लिए मजबूर भी किया। यह उन्हीं समर्पित कलम के सिपाहियों की सजगता और पत्रकारिता के प्रति निष्ठा का ही परिणाम था जो राज्य सहित केन्द्रीय स्तर पर सत्ता परिवर्तित हुई।  यही स्थिति आज भी है लेकिन सिर्फ उन लोगों के लिए जिन्होंने पत्रकारिता को एक पवित्र मिशन माना है और लोक कल्याण का हथियार भी। यही कारण है कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का सजग प्रहरी और चौथा-खम्भा भी कहा जाता हे।

लेकिन आज स्थिति बिल्कुल बदली बदली सी है। तथाकथित "विश्व-ग्राम" की परिकल्पना को स्थापित करने की दिशा में कार्यरत पूँजीवादी शक्तियों ने इस पूरी दुनिया को ही एक बाजार में तब्दील कर दिया। आज भौतिक वस्तुओं के अतिरिक्त सामाजिक सम्बन्ध, साहचर्य, आपसी प्रेम, रिश्ते-नाते सब जगह किसी ना किसी रूप में बाजार पहुँच चुका है। यहाँ तक कि मानव जीवन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई परिवार भी टूटन के कगार पर है। फिर यह पत्रकारिता कैसे बची रह सकती है? जन-जागरण का यह मिशन भी आज बाजारवाद की जद में बुरी तरह से जकड़ गया है और पीत-पत्रकारिता करके धन कमाने का जरिया भी।

याद आती है ग्लोबलाइजेशन के पूर्व के दिनों की जब मात्र चार पन्ने के अखबार हुआ करते थे जिसके एक एक हर्फ के पढ़े बिना चैन नहीं मिलता था। लेकिन आज सोलह, अठारह, कभी कभी बीस-बाईस पृष्ठों के अखबार में पठनीय सामग्री कितनी हैं? जनहित की बातें कितनी हैं? यह सवाल सिर्फ मेरा नहीं बल्कि वैसे आमलोगों का भी है जिनकी आवाज कोई नहीं सुनता। आज बाजारवाद के निरन्तर विस्तार के कारण सरकार और अखबार स्थिति यह हो गयी है कि कई बार यह कहने के लिए विवश होना पड़ता है कि-

जिसकी कार सर के ऊपर से गुजर जाए उसे सरकार कहते हैं
विज्ञापन के बाद यदि कुछ खबर मिल जाय उसे अखबार कहते हैं

सचमुच यही दुखद स्थिति हमारे सामने है। अब तो खबरें भी प्रायोजित होने लगीं हैं। "पेड खबरों" की चर्चा भी आप हम सब देखते सुनते रहते हैं।

देश की हालत बुरी अगर है
संसद की भी कहाँ नजर है
सूर्खी में प्रयोजित घटना
खबरों की अब यही खबर है

और आम आदमी का सवाल लाजिम है कि -

खुली आँख से सपना देखो
खबर कौन जो अपना देखो
पहले तोप मुक़ाबिल था, अब
अखबारों का छपना देखो

एलेक्ट्रोनिक मीडिया पर तो बाजारवाद का और गहरा असर है। आखिर चौबीस घन्टे समाचार चलेंगे केसे? एक समाचार को बार बार दिखाना और समाचार चैनलों में गाना, तंत्र-मंत्र, ज्योतिष, फिल्मी नायक-नायिकायों की प्रेम कहानी को मशाला लगाकर परोसना और ना जाने क्या क्या दिखलाया जाता है।

चौबीस घंटे समाचार क्यों
वही सुनाते बार बार क्यों
इस पूँजी, व्यापार खेल में
सोच मीडिया है बीमार क्यों

समाचार में गाना सुन ले
नित पाखण्ड तराना सुन ले
ज्योतिष, तंत्र-मंत्र के संग में
भ्रषटाचार पुराना सुन ले

एलेक्ट्रोनिक चैनलों में यह दिखलाने की होड़ मची है कि सबसे पहले हमारा चैनल यहाँ पहुँचा और कुछ हृदय विदारक दृश्य को बार बार जब दिखलाते हैं तो अन्तर्मन से निकलता है कि -

सबसे पहले हम पहुँचे।
हो करके बेदम पहुँचे।
हर चैनल में होड़ मची है,
दिखलाने को गम पहुँचे।

मजे की बात है कि आज भी अस्सी प्रतिशत लोग गाँवों में रहते हैं लेकिन समाचार चैनल सिर्फ मुख्य मुख्य शहरों तक की खबरों को दिखलाने में मस्त है। तब चौथे खम्भे की वर्तमान रुग्ण-मानसिकता पर स्वतः ये पंक्तियाँ फूट पड़तीं हैं कि -

सब कहने का अधिकार है।
चौथा-खम्भा क्यूँ बीमार है।
गाँव में बेबस लोग तड़पते,
बस दिल्ली का समाचार है।

आज विश्व-बाजारवाद के कारण सचमुच यही स्थिति आ गयी है हमारे सामने। अधिक से अधिक धन कमाने की लालच में पत्रकारिता का यह पवित्र-कर्म बहुत प्रभावित हुआ है। आज अपराध से संबंधित जितनी भी खबरें आ रहीं हैं प्रायः सारी खबरें शाम के समय स्थानीय थाना से सम्पर्क करके बैठे बिठाये प्राप्त किए जा रहे हैं। घटना स्थल पर जाने का झमेला कोई मोल नहीं लेना चाहता। दुनिया की सारी सुख सुविधाएं कम समय में पाने की भूख, पत्रकार होने का झूठा अहं, देशहित और जनहित की भावना से अभावग्रस्त लोगों का इस पेशा में आना आदि अनेक कारण हैं जिससे पत्रकारिता के स्तर में गिरावट आयी है।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आज भी कई ऐसे लोग हैं इस मिशन में जो कुर्बानी देकर पत्रकारिता मिशन की पवित्रता को बनाये हुए हैं। कई उदाहरण हैं हमारे आपके सामने जब पत्रकारों ने अपने धर्म का बखूबी पालन किया है और आज भी कर रहे हैं। बात निराशा की नहीं बल्कि सचेत होने की जरूरत है इन आन्तरिक विद्रूपताओं से। अन्त में पत्रकार बहनों भाईयों से इन पंक्तियों के द्वारा अपील करना चाहता हूँ कि -

समाचार, व्यापार बने ना
कहीं झूठ आधार बने ना
सुमन सम्भालो मर्यादा को
नूतन दावेदार बने ना

चौथा - खम्भा दर्पण है।
प्रायः त्याग-समर्पण है।
भटके लोग सुधर जाएं तो,
सुमन-भाव का अर्पण है।



Tuesday, September 24, 2013

न्यायपालिका के पंख कुतरने की कोशिश

 "यह आरोप मेरी बढ़ती लोकप्रियता के कारण विरोधियों ने साजिश के तहत लगाया है" - "मुझे भारत की न्याय प्रणाली पर पूरा भरोसा है" - आदि आदि ---पिछले २-३ दशकों से आरोपी रहनुमाओं के ऐसे खोखले बयान सुन सुनकर हम सभी आजिज हो गए हैं। जब जब न्यायालय द्वारा देशहित में कोई महत्वपूर्ण फैसला दिया है जो तथाकथित "रहनुमाओं" के हित के विपरीत जाता है तो युद्ध-स्तर पर सरकार संसद द्वारा न्यायिक व्यवस्था के पंख कुतर दिए जाते हैं। हमारे आपके सामने शाहबानो प्रकरण से लेकर आज तक कई उदाहरण हैं। उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय से दागी रहनुमाओं को सीधा सीधी बचाने की दिशा में वर्तमान सरकार द्वारा २४-०९-२०१३ को लाया गया यह अध्यादेश यही साबित करता है कि इन "रहनुमाओं" को भारतीय न्याय प्रणाली पर कितना "भरोसा" है?

रामायण में विश्व कवि तुलसी दास जी ने एक प्रसंग में लिखा है कि - "को बड़ छोट कहत अपराधू" - आज यह कथन भारतीय लोकतंत्र के रक्षक "माननीयों" के ऊपर शत-प्रतिशत लागू हो रहा है। किसको अच्छा कहें? सब तो "मौसरे भाई" हैं। कुछ थोड़े से सचमुच अच्छे प्रतिनिधि हैं, उनकी सुनता ही कौन है?

अब तक के ज्ञात सारे शासन-तंत्र में लोकतंत्र आज पूरी दुनिया में एक अच्छी शासन व्यवस्था के रूप में स्वीकृत है। लेकिन भारत में इस पवित्र व्यवस्था से भी अब दर्गन्ध आने लगी है।  लोकपाल विधेयक - जनहित की दिशा में एक सार्थक पहल - पिछले ४५ साल से सदन में लम्बित है लेकिन करीब ४५ दिनों में ही आरोपी "जन प्रतिनिधियों" को बचाने के लिए अध्यादेश लाया गया और कम से कम ४५ बार सर्व सम्मति से "माननीयों" के वेतन-भत्ता में वृद्धि की गयी। कितना भद्दा मजाक है? अपनी एक गज़ल की कुछ पंक्तियों से बात समाप्त करूँ कि - 

कौन संत है कौन लुटेरा


कहने को साँसें चलतीं पर जीवन है लाचार यहाँ
सत्ता की सारी मनमानी क्यों करते स्वीकार यहाँ

वतनपरस्ती किसके दिल में खोज रहा हूँ सालों से
नीति-नियम और त्याग-समर्पण की बातें बेकार यहाँ

संविधान को अपने ढंग से परिभाषित करते सारे
छीन लिए जाते हैं यारो जीने का अधिकार यहाँ

दिखलायी देती खुदगर्जी रिश्तों में, अपनापन में
टूटा गाँव, समाज, देश भी टूट रहा परिवार यहाँ

आजादी की अमर कहानी नहीं पढ़ाते बच्चों को
वीर शहीदों के सपने भी शायद हो साकार यहाँ

भूखे की हालत पर लिखना बिना भूख वो क्या जाने
रोजी रोटी पहले यारो कर लेना फिर प्यार यहाँ

कौन संत है कौन लुटेरा यह पहचान बहुत मुश्किल
असली नकली सभी सुमन के लोग करे व्यापार यहाँ